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: एक पुत्र का मां के लिए स्मृति लेख( मां पुत्र की विश्वकर्मा होती है )

admin Sun, Nov 12, 2023

बीघापुर उन्नाव
इस दिवाली पर  मां को याद करते हुए गौरव अवस्थी का लेख ।
लिखा जो खत हमें, वो तेरी याद में, हजारों रंग के...
पूर्वजों, ऋषियों-मुनियों ने संस्कारों को जीवित रखने के लिए अनुभव सिद्धि के बाद कई तरह की मान्यताएं निर्मित कीं।
इसी में एक है, साफ सफाई। यह भी स्वस्थ जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष है।
दिवाली साफ सफाई का त्योहार है। मान्यता है कि जहां गंदगी होती है, वहां लक्ष्मीजी नहीं पधारतीं।
भला कौन चाहेगा कि लक्ष्मी जी नाराज हों? घर न पधारें। फिर जब दौर-दौरा ही 'लक्ष्मी' केंद्रित हो। इस मान्यता की महत्ता केवल इतनी ही नहीं है।
साफ सफाई के बीच भी कभी-कभी ऐसा 'धन' हाथ लग जाता है जो सब 'धनों' से ज्यादा धनवान बना देता है।
मेरे जन्म के सिर्फ 4 साल बाद 1969 में बनी फिल्म 'कन्यादान' में मोहम्मद रफी ने मशहूर गाना गाया था- 'लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में, हजारों रंग के नजारे बन गए..सितारे बन गए..' रील वाली लाइफ में ऐसे गाने प्रेमी प्रेमिका या प्रेमिका प्रेमी के लिए ही गाता है पर रियल लाइफ में ऐसा प्रेम और भाव केवल और केवल मां अपने बच्चे के लिए गाती ही नहीं है।
जीती है। 'मां' तो मां होती है।
अपना निर्माण मानती है। इसलिए जरूरत पर मारती भी है और मनाती भी। सब कुछ 'अच्छी' और 'सच्ची' फसल के लिए..। जिस तरह किसान खेत में 'उत्पादनवृद्धि', 'स्वास्थ्यवद्धि', 'धनवृद्धि' की कामना से बीज बोता है। बीज बोने के पहले किसान खेत जोतता भी है। खेत जोतना वैसा ही है, जैसी मां की ठुकाई।
पिछले दिनों पुराने कागज अलटते-पलटते समय मम्मी ( स्मृति शेष मोहिनी अवस्थी) के हाथ का दिवाली के लिए ही लिखा हुआ एक खत हाथ लगा। ख़त (संलग्न) क्या? खजाना।
संस्कारों का बीजारोपण।
मीठी हिदायत मिला हुआ प्यार और दुलार। धन-यश-ऐश्वर्य की कामना और साथ में यह सीख भी-'बिना मेहनत कुछ भी हासिल नहीं होता।
अगर हासिल हो भी तो वह 'हाशिए' समान है। सच्चा हासिल तो वही है, जो जीवन बनाए।
महकाए। कागज के फूलों से कौन बगिया महकी है भला! बिल्कुल वैसा ही संदेश जैसा भवानी प्रसाद मिश्र की कविता की लाइनों में उतरा था कभी- 'कुछ लिख के सो, कुछ पढ़ के सो, सोया जहां तू आज, दो कदम बढ़ के सो..'
मां के इस तकरीबन ढाई दशक पुराने पत्र को पढ़ते हुए अपनी निर्मिति में 'मां' का महत्व फिर याद आ गया।
यह पत्र तो एक लिखित प्रमाण भर है। यह पत्र उस दरवाजे सरीखा है, जो यादों के 'महल' में प्रवेश का रास्ता बता-दिखा रहा है।
मां की कित्ती कोशिशें तो अलिखित ही रह जाती हैं पर महसूस हर कदम होती हैं।
इस सबके बीच यह समझना या मानना बड़ी भूल है कि हम केवल मां की निर्मिति हैं।
जीवन के विभिन्न चरणों में 'मां' अलग-अलग रूप में उपस्थित रहती है। कभी दादी-नानी के रूप में।
कभी बहन-बेटी के रूप में। कभी पत्नी और भाभी के रूप में। मां जन्मदात्री है।
निर्माणकर्ता भी पर जीवन में मातृरूप महिलाओं के योगदान भी कम नहीं होते।
मातृरूपेण संस्थिता.. मेरे अपने जीवन में मां यानि मातृशक्ति का बहुत महत्व है।
दो पीढ़ी पीछे। एक पीढ़ी आगे और अपनी समकक्षीय पीढ़ी।
चार पीढ़ियों की मातृशक्तियों के माध्यम से निर्मिति का यह क्रम आज भी जारी है।
सिर्फ मेरे ही क्यों हर मनुष्य (पुरुष) की अंतिम श्वांस तक निर्मिति जारी रहती है।
इससे भला किसको इंकार? जिसे इंकार उस भर अभागा कोई नहीं!!
इस दिवाली अपने जीवन का अब तक का हासिल सब मां और मातृरूपों को अर्पित-समर्पित। एक अदद छत भी मां की असीम कृपा का फल है और यश का आसमां भी उन्हीं की देन।
जीवन की हर अच्छाई मां-बदौलत और कमजोरी मेरी अपनी देन। इस दिवाली उस 'मां' से इस 'मां' को मेरा हृदय से प्रणाम !! यश-धन- ऐश्वर्य की मां लक्ष्मी, देवी दुर्गा आप पर कृपालु रहें..
बल-बुद्धि प्रदाता भगवान श्रीगणेशजी शक्ति संचय करते हुए दुरबुद्धियों से दूर ही रखें..