: बांग्लादेश में चुनाव आज,भारत चीन क्यों चाहते है कायम रहे हसीना सरकार?
admin Sun, Jan 7, 2024
17 करोड़ की आबादी वाले मुल्क बांग्लादेश में आज आम चुनाव हो रहे हैं। एक तरफ शेख हसीना ने रिकॉर्ड चौथी बार सत्ता में आने का दमखम लगा दिया है। वहीं, मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने बायकॉट का बिगुल बजा रखा है।
इस बीच हिंसा से जूझ रहे बांग्लादेश के इन चुनावों पर दुनियाभर की नजरें टिकी हैं।
भारत और चीन ही नहीं बल्कि रूस से लेकर अमेरिका तक की दिलचस्पी बांग्लादेश के चुनाव में बनी हुई है। लेकिन बांग्लादेश के चुनाव में इन सुपरपावर देशों की इतनी दिलचस्पी की वजह क्या है? इसका जवाब जानने के लिए इन देशों के हितों को समझने की जरूरत है।
युद्ध की जमीन से 1971 में जन्मे बांग्लादेश का 52 सालों का इतिहास किसी से छिपा नहीं है। संघर्षों की दहलीज पार कर इस मुल्क की अर्थव्यवस्था 400 अरब डॉलर को पार कर गई है। बांग्लादेश आज आर्थिक और भूराजनीतिक रूप से ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां दुनिया के कई कद्दावर देश उसकी तरफ कदम बढ़ा रहे हैं।
भारत के लिए कितना जरूरी है बांग्लादेश?
जब भारत अपने पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की तरफ देखता है, तो इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि 1996 से 2001 तक और फिर 2009 से लगातार भारत को बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियों से सहयोग मिला है। बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने अपने देश में भारत विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगाने के प्रयास किए हैं।
बांग्लादेश चुनाव के नतीजों का यकीनन भारत के साथ उसके संबंधों पर असर पड़ने वाला है। प्रधानमंत्री शेख हसीना की अगुवाई में 14 पार्टियों का गठबंधन विपक्षी दल बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ खड़ा है। इसे एक तरह से विचारों की जंग कहा जा सकता है।
बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार को लंबे समय से भारत का समर्थन मिला है। इसकी वजह है कि शेख हसीना की अवामी लीग सरकार देश में चरमपंथी और कट्टरपंथी तत्वों पर लगाम लगाने में काफी हद तक कामयाब रही है।
कहा जा रहा है कि अगर विपक्षी पार्टियों विशेष रूप से इस्लामिक पार्टियां सत्ता में आती है तो बांग्लादेश में अराजकता फैल सकती है और इसका भारत के हितों पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत चाहता है कि अवामी लीग एक बार फिर चुनाव जीतकर सत्ता में वापसी करे।
मोदी और शेख हसीना की गोल्डन पार्टनरशिप
भारत और बांग्लादेश सिर्फ पड़ोसी मुल्क ही नहीं है बल्कि गहरे पार्टनर्स भी हैं। शेख हसीना जब 2022 में भारत दौरे पर आई थीं।
उन्होंने कहा था कि हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत ने हमारी आजादी में कितना बड़ा योगदान दिया है। वह इससे पहले भी भारत को बांग्लादेश का टेस्टेड फ्रेंड (परखा हुआ दोस्त) बता चुकी हैं।
भारत भी अपने पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा संबंधी हितों के लिए बांग्लादेश पर भरोसा करता है। यही वजह भी है कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में हिंसा और घुसपैठ करने वाले जिहादी संगठनों पर बांग्लादेश समय-समय पर चाबुक चलाता रहा है।
ऐसे में कह सकते हैं कि भारत और बांग्लादेश के हित एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक तरफ जहां पूर्वोत्तर के राज्यों की सुरक्षा और जिहादी संगठनों पर नकेल कसने के लिए भारत को बांग्लादेश की जरूरत है।
मोदी सरकार की 'लुक ईस्ट' और 'एक्ट ईस्ट' पॉलिसी के लिए भी बांग्लादेश बहुत जरूरी है। इन नीतियों में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, डिजिटिल इंटीग्रेशन, व्यापार, निवेश और एनर्जी कोलेबोरेशन शामिल हैं।
वहीं, बांग्लादेश के लिए भी भारत के मायने बहुत हैं। भारत ने रक्षा आयात के लिए बांग्लादेश को 50 करोड़ डॉलर का ऋण भी दिया है।
बांग्लादेश पर आंख गड़ाए बैठा है अमेरिका
बांग्लादेश के चुनाव पर अमेरिका की पैनी नजर है। अमेरिका अक्सर शेख हसीना सरकार पर भ्रष्टाचार और लोकतंत्र का गला घोंटने के गंभीर आरोप लगाते रहा है। अमेरिका मुख्य विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का लगातार समर्थन कर शेख हसीना सरकार का आड़े हाथों लेता रहा है।
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, ढाका में अमेरिकी दूतावास विपक्ष के लिए जमीन तलाशने में जुटा हुआ है।
बांग्लादेश के अर्धसैनिक बल रैपिड एक्शन बटालियन का कहना है कि दिसंबर 2021 से ही अमेरिका एक तरह से शेख हसीना पर लगातार दबाव बना रहा है।
इसी कड़ी में पिछले साल अमेरिका ने विशेष रूप से बांग्लादेश के आला अधिकारियों, नेताओं और न्यायपालिका से जुड़े लोगों के लिए वीजा पर प्रतिबंध लगा दिए थे।
राष्ट्रपति बाइडेन ने 2021 और 2023 में 'डेमोक्रेसी समिट' से बांग्लादेश को कथित तौर पर जानबूझकर बाहर भी रखा था।
कहा गया कि इसके लिए बांग्लादेश की आंतरिक स्थिति को जिम्मेदार ठहराया गया था।
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