: जयंती की पूर्व संध्या पर ( 7जनवरी ) विशेष चंद्रशेखर आजाद: मानहुंवीर रस धरे सरीरा।
admin Sat, Jan 6, 2024
जयंती की पूर्व संध्या पर ( 7जनवरी ) विशेष चंद्रशेखर आजाद: मानहुंवीर रस धरे सरीरा..
रात के लगभग दो बजे अचानक द्वार पर खट! खट! खट! शब्द हुआ।
मैंने प्रति उत्तर में कहा- कौन साहब हैं?
उत्तर मिला- दरवाजा खोलिए।
मैं बोला-'आप अपना नाम तो बताइए।'
'नाम पीछे बताया जाएगा। पहले दरवाजा खोलिए।'
आवाज में अजीब दृढ़ता थी। कमरे में अंधेरा था। चटखनी खोलते ही हट्टे-कट्टे दो नवजवान कमरे में दाखिल हुए। उनमें से एक कुछ परिचित स्वर में बोला-
'इन्हें पहचानते हैं आप?'
मेरे मुंह से निकला- ठहरिए लालटेन जला लूं।
अब दोनों मूर्तियां प्रत्यक्ष थीं । एक परिचित और दूसरी बिल्कुल अजनबी।
तब तक परिचित सज्जन के मुंह से निकला-
'ये हैं चंद्रशेखर आजाद'।
आजाद का नाम सुनते ही मेरी नस-नस में बिजली दौड़ उठी। मैं उनके चेहरे को गौर से देखने लगा। वीर और रौद्र रस की संजीव प्रतिमा मेरे नेत्रों के सामने खड़ी थी। गोस्वामी तुलसीदास के शब्द मेरे सम्मुख मूर्तिमान हो थिरक उठे-
'मानहुं वीर रस धरे सरीरा'
उन्नत ललाट, चौड़ा वक्षस्थल। आजान बाहु। गठीला बदन और चेहरे पर चेचक के दाग़। यही चंद्रशेखर आजाद की आकृति थी। उनके रोम-रोम से वीरता और उत्साह फूटा पड़ रहा था। दूसरे युवक जो सौम्यता और गंभीरता की प्रतिमा थे, मुस्कुराते हुए बोल उठे-' क्या पंडित जी अब भी मुझे सीआईडी का आदमी समझते हैं?' इस प्रश्न के करने वाले थे दूसरे युवक श्री भगवतीचरण।
श्री भगवतीचरण मेरे पूर्व परिचित थे। इस समय यह दोनों ही युवक फरार थे। उनकी गिरफ्तारी का इनामी वारंट भारत सरकार की ओर से निकल चुका था। देश के हर प्रांत में अंग्रेज नौकरशाही पुलिस इन क्रांतिकारी युवकों की तलाश में रात दिन एक कर रही थी..।
फरारी हालत में यह दोनों ही युवक अपने कफन हथेली पर लिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने की साध लिए अपना काम करते जा रहे थे। हर नगर और ग्राम में स्वाधीनता की अलख जागते हुए ऋषियों के अमर संदेश का उद्घोष करते फिर रहे थे-
' उत्तिष्ठत जागृत प्राप्त वरणम्य बोधत।'
उठो! जागो! और श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर आत्मबोध प्राप्त करो..।
आजाद बड़े विनोदप्रिय थे। बातचीत में व्यंग्य भरे स्वर में मीठी चुटकी लेना उनके स्वभाव की ऐसी विशेषता थी, जो कभी भुलाई नहीं भूलती। चंद्रशेखर आजाद के साथ वह हमारी प्रथम भेंट थी। वह चले गए किंतु पहली मुलाकात में ही मेरे हृदय पर अपने उज्जवलतर हठ चरित्र की अमिट छाप छोड़ गए जो जीवन के अंतिम क्षण तक विस्मृत नहीं हो सकी। उस प्रथम भेंट के बाद चंद्रशेखर आजाद और उनके अनेक विश्वस्त साथियों के लिए मेरे घर का द्वार बिना किसी भय और संकोच के सदा के लिए खुल गया। श्री भगवतीचरण से उसके बाद फिर कभी भेंट नहीं हुई। हां, कुछ समय बाद ही उस बम के ऊपर की टो देखने को जरूर मिली जिसके विस्फोट से लाहौर से कुछ दूर जंगल में वह घायल हुए और अंत में उनका प्राणांत हो गया था..।
चंद्रशेखर आजाद प्राय: कमीज, खुले गले का कोट और धोती पहने देखे जाते थे। बाएं हाथ की कलाई में रिस्टवॉच खूब फबती थी। दोनों जेबों में दो रिवाल्वर डाले खुलेआम सड़क पर मस्तानी चाल से चलते हुए उन्हें देखकर कवि के यह शब्द आए बिना न रहते थे-
'जब से सुना है मरने का नाम जिंदगी है
सर से कफ़न लपेट कातिल को ढूंढते हैं।'
एक बार संयोगवश एक विचित्र घटना का सामना करना पड़ा। जिसकी याद आने पर आज हंसी आए बिना नहीं रहती। कोटला (आगरा) गांव के निवासी मेरे मित्र और हितेषी स्व. ठाकुर महेंद्र पाल सिंह जी मेरे यहां भोजन के लिए आमंत्रित थे। उनके आने में थोड़ी ही देर थी। इतने में चंद्रशेखर आजाद ने मुस्कुराते हुए मेरे घर में प्रवेश किया। मेरी पत्नी चौके में भोजन बनाने में व्यस्त थीं।
आजाद ने आवाज दी-बहिन, किस उधेड़बुन में लगी हो।'
वह चौके से ही धीमे स्वर में बोलीं -
'आ रही हूं भैया, आप बैठिए'।
इतने ही में मैंने चर्चा छेड़ दी-
'डिप्टी साहब आ रहे हैं। हम लोग उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहे हैं।'
कौन डिप्टी साहब- आजाद ने पूछा।
मैं -'ठाकुर महेंद्र पाल सिंह। यह पहले झांसी में डिप्टी कलेक्टर थे । आजकल वहां से अन्यत्र उनका तबादला हो गया है।'
आजाद -'इनका और आपका कब से और क्या संबंध है'।
मैंने कहा -' यह मेरे गांव के हैं। यद्यपि उम्र में मुझसे बड़े हैं। फिर भी बचपन में मैं उनके और उनके भाइयों के साथ खूब खेला। उनके पूर्वज कोटला रियासत के दीवान थे।
यह सुनते ही आजाद की मुखाकृति कुछ गंभीर हो गई। उन्होंने तुरंत ही घर से बाहर जाने का विचार प्रकट किया किंतु मैं उनका हाथ पकड़े हुए घर के भीतर के कमरे में ले गया और वहां पड़े हुए एक पलंग पर बैठाकर आग्रह पूर्वक कहा-
' अब यह समय आपके घर से बाहर जाने का नहीं है। आप निश्चिंत होकर यहां बैठिए। डिप्टी साहब के चले जाने पर कुछ आपसे आवश्यक बातें करूंगा।'
आजाद-' डिप्टी साहब का ड्राइवर कौन है। आप उसे जानते हैं?'
मैंने कहा -' हां, मैं अच्छी तरह जानता हूं। उनके ड्राइवर का नाम महेश है। उनकी गाड़ी पर वही आएगा।'
आजाद ने कहा, पर महेश तो मुझे पहचानता है।
मैंने पूछा- सो कैसे?
आजाद ने बताया-' मैं छद्मवेश में झांसी में एसपी की मोटर का ड्राइवर था, तभी से।'
मैं आजाद की बात सुनकर स्तब्ध रह गया।
हे राम! भारतीय क्रांतिकारी सेवा का प्रमुख सेनानी चंद्रशेखर आजाद फरारी हालत में झांसी के एसपी का मोटर ड्राइवर!
मैंने मुस्कुराकर आजाद से कहा-
महेश से आपका क्या मतलब है। इस समय तो मेरे मित्र डिप्टी साहब मेरे घर आ रहे हैं और आप भी मेरे भाई के रूप में उपस्थित हैं।
दोनों ही की मेरे यहां आज दावत है। यह दायित्व अचानक ईश्वर ने मेरे ऊपर डाला है कि मैं अपने दोनों ही अतिथियों का निष्ठा के साथ स्वागत-सत्कार करूं। आप आज मेरे साथ ही खाना खाएंगे। निश्चिंत होकर थोड़ी देर विश्राम करें।'
मैं कमरे से बाहर आकर आंगन में खड़ा ही हुआ था कि डिप्टी साहब की मोटर का हॉर्न सुनाई दिया। मैं तत्काल बाहर आया। डिप्टी साहब गाड़ी से उतरे और मेरे घर की ओर बढ़े।
बैठक में प्रवेश करते ही डिप्टी साहब की नजर चारों ओर किताबों से भरी अलमारी की ओर गई बोले- पुस्तकें बहुत जमा कर रखी हैं। खाना खाने के कुछ देर बाद डिप्टी साहब विदा हो गए..।
अब आजाद को उठाकर मैं आंगन में ले आया। तुरंत ही दो आसनों पर हम लोग जम गए। पत्नी ने भोजन परोसा और हम लोगों ने भोजन शुरू किया।
खाते-खाते अचानक आजाद से पूछा-'आपने भी आफत के परकालेवाली मसल को चरितार्थ करके कमाल कर दिया। कहां आप एसपी के मोटर ड्राइवर के रूप में, सो भी फरारी हालत में, और कहां डिप्टी कलेक्टर ठाकुर महेंद्र पाल सिंह का मोटर ड्राइवर महेश।'
आजाद ने हंसते-हंसते अपने हाथ का अंगूठा दिखाया, जिसमें चोट का निशान था। इस निशान को महेश पहचानता था। उन्होंने यह भी बताया कि उन दिनों महेश ड्राइवर तथा कुछ और अफसर के नौकरों-चाकरों से उनकी दोस्ती हो गई थी।
इस दोस्ती का उपयोग करने पर पुलिस और खुफिया पुलिस के क्षेत्र के भीतरी और गुप्त भेद उन्हें भली-भांति मालूम हो जाते थे। इससे क्रांतिकारी दल अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने में पूरा लाभ उठाता था।
साक्षात मृत्यु के मुंह में बैठकर काल से खेल खेलना नरपुंगव आजाद ही का काम था, जिसका सानी देश के इतिहास में दूसरा मिलना कठिन है।
महीनों की नौकरी के बाद एक दिन अचानक आजाद एसपी के बंगले से बिना कुछ कहे-सुने गायब हो गए। काफी अरसे बाद पुलिस और खुफिया तंत्र को पता चला कि वही चंद्रशेखर आजाद थे, जिनके पकड़ने के लिए बहुत पहले ही भारत सरकार की ओर से इनामी वारंट निकल चुका है..।
(चंद्रशेखर आजाद के साथी रहे सुरेंद्र शर्मा का यह संस्मरण इतिहासकार सुधीर विद्यार्थी द्वारा संपादित शहीद चंद्रशेखर आजाद की क्रांतिकारी जीवन कथा 'अग्निपुंज' पुस्तक से साभार)
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