Advertisment

26 जनवरी 2026 से e paper tv भारतवर्ष पढ़े हर रोज

30th September 2026

BREAKING NEWS

TV Bharatvarsh E Paper 01-09-2026

TV Bharatvarsh E Paper 27-08-2026

TV Bharatvarsh E Paper 26-08-2026

TV Bharatvarsh E Paper 25-08-2026

TV Bharatvarsh E Paper 23-08-2026

: चंद्रशेखर आज़ाद की पुण्य तिथि पर विशेष ।आजाद जीयेंगे,आजाद मरेंगे।

admin Thu, Feb 27, 2025

आजाद स्पेशल

चंद्रशेखर आज़ाद की पुण्य तिथि पर विशेष 

चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

उनका अदम्य साहस, देशभक्ति और बलिदान आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

प्रारंभिक जीवन

चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा (अब आज़ाद नगर) में हुआ था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। उनका बचपन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहा, लेकिन उनमें देशभक्ति की भावना बचपन से ही कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने वाराणसी के काशी विद्यापीठ में शिक्षा प्राप्त की, जहाँ वे स्वतंत्रता संग्राम के प्रति प्रेरित हुए।

क्रांतिकारी जीवन

1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, तब मात्र 15 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर उसमें कूद पड़े। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और अदालत में जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम "आज़ाद", पिता का नाम "स्वतंत्रता", और निवास स्थान "जेल" बताया। तभी से वे "चंद्रशेखर आज़ाद" के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के बाद वे क्रांतिकारी मार्ग पर चल पड़े और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़ गए। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खाँ जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने कई महत्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया।

मुख्य क्रांतिकारी गतिविधियाँ

1. काकोरी कांड (1925) – इस घटना में चंद्रशेखर आज़ाद और उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार के खजाने से भरी ट्रेन को लूटकर अंग्रेजों को चुनौती दी।

2. सांडर्स वध (1928) – लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह और राजगुरु के साथ मिलकर पुलिस अधिकारी सांडर्स को मार गिराया।

3. दिल्ली असेंबली बम कांड (1929) – भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर असेंबली में बम फेंकने की योजना बनाई, जिससे अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया जा सके।

बलिदान और शहादत

27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के एल्फ्रेड पार्क में थे, जब अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने बहादुरी से मुकाबला किया और कई ब्रिटिश सैनिकों को मार गिराया।

जब उनके पास आखिरी गोली बची, तो उन्होंने खुद को गोली मारकर बलिदान दे दिया, लेकिन अंग्रेजों के हाथों जीवित नहीं पकड़े गए। उनका यह बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अमर हो गया।

चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन साहस, बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अद्भुत मिसाल है। उनका दृढ़ संकल्प और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण हर भारतीय के लिए प्रेरणादायक है। आज भी उनका नारा –

"दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे,

आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही मरेंगे!"

हमें उनके आदर्शों को अपनाकर देश की एकता और विकास के लिए कार्य करना चाहिए। चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता,

वे सदा हमारे हृदय में जीवित रहेंगे।