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विदेश मंत्रालय के बयान से छिड़ी नई बहस

: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 देता है भारत में रहने वाले वयस्क मतदाताओं को मताधिकार।

admin Fri, May 10, 2024

               लोकतंत्र

लोकतन्त्र या 'प्रजातन्त्र' एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसके अन्तर्गत जनता अपनी स्वेच्छा से निर्वाचन में आए हुए किसी भी उम्मीदवार को मत देकर अपना प्रतिनिधि चुन सकती है।

लोकतन्त्र शासन का एक ऐसा रूप है,जिसमें शासकों का चुनाव लोग करते हैं।

तथा उसे विधायिका बन सकती है।

लोकतन्त्र दो शब्दों से मिलकर बना है, "लोक + तन्त्र"।

प्रत्येक राज्य चाहे वह उदारवादी हो या समाजवादी या साम्यवादी, यहाँ तक कि सेना के जनरल द्वारा शासित पाकिस्तान का अधिनायकवादी भी अपने को लोकतान्त्रिक कहता है।
सच पूछा जाये तो आज के युग में लोकतान्त्रिक होने को दावा करना एक फैशन सा हो गया है।
लोकतन्त्र की पूर्णतः सही और सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है।
क्रैन्स्टन ने ठीक ही कहा है कि लोकतन्त्र के सम्बन्ध में अलग-अलग धारणाएँ है।
लिण्सेट की परिभाषा अधिक व्यापक प्रतीत होती हैं उसके अनुसार, “लोकतन्त्र एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली है जो पदाधिकारियों को बदल देने के नियमित सांविधानिक अवसर प्रदान करती है और एक ऐसे रचनातंत्र का प्रावधान करती है।
जिसके तहत जनसंख्या का एक विशाल हिस्सा राजनीतिक प्रभार प्राप्त करने के इच्छुक प्रतियोगियों में से मनोनुकूल चयन कर महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करती है।
मैक्फर्सन ने लोकतन्त्र को परिभाषित करते हुए इसे एक मात्र ऐसा रचना तन्त्र माना है जिसमें सरकारों को चयनित और प्राधिकृत किया जाता है ।
अथवा किसी अन्य रूप में कानून बनाये और निर्णय लिए जाते हैं।
शूप्टर के अनुसार, ‘लोकतान्त्रिक विधि राजनीतिक निर्णय लेने हेतु ऐसी संस्थागत व्यवस्था है जो जनता की सामान्य इच्छा को क्रियान्वित करने हेतु तत्पर लोगों को चयनित कर सामान्य हित को साधने का कार्य करती है। वास्तव में, लोकतन्त्र मूलतः नागरिक और राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए सहभागी राजनीति से संबद्ध प्रणाली है। लोकतन्त्र की अवधारणा के सम्बन्ध में प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं।
1. लोकतन्त्र का पुरातन उदारवादी सिद्धान्त।
2. लोकतन्त्र का अभिजनवादी सिद्धान्त।
3. लोकतन्त्र का बहुलवादी सिद्धान्त।
4. प्रतिभागी लोकतन्त्र का सिद्धान्त।
5. लोकतन्त्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त अथवा जनता का लोकतन्त्र।
बहुसंख्यक जनसमुदाय, जो गैर-अभिजनवर्ग का निर्नायक है, में अधिकांश भावशून्य, आलसी और उदासीन होते हैं, इसलिए एक ऐसा अल्पसंख्यक वर्ग का होना आवश्यक है जो नेतृत्व प्रदान करे।
 अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आज के जटिल समाज में कार्यक्षमता के लिए विशेषज्ञता आवश्यक है और विशेषज्ञों की संख्या हमेशा कम ही होती है।
अतः राजनैतिक नेतृत्व ऐसे चुनिंदा सक्षम लोगों के हाथ में होना आवश्यक है।
लोकतन्त्र मात्र एक ऐसी कार्यप्रणाली है जिसके द्वारा छोटे समूहों में से एक जनता के न्युनतम अतिरिक्त समर्थन से शासन करता हैं।
अभिजन वादी सिद्धान्त यह भी मानता है कि अभिजन वर्गों- राजनीतिक दलों, नेताओं, बड़े व्यापारी घरानों के कार्यपालकों, स्वैच्छिक संगठनों के नेताओं और यहां तक कि श्रमिक संगठनों के बीच मतैक्य आवश्यक है ताकि लोकतंत्र की आधारभूत कार्यप्रणाली को गैर जिम्मेदार नेताओं से बचाया जा सके।
 सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार लोकतंत्र वास्तविक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की समान सहभागिता है, न कि मात्र सरकार को स्थायी बनाए रखना जैसा कि अभिजन वादी अथवा बहुलवादी सिद्धान्त कार मान लेते हैं।
सच्चे लोकतन्त्र का निर्माण तभी हो सकता है जब नागरिक राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हों और सामूहिक समस्याओं में निरन्तर अभिरूचि लेते रहें।
सक्रिय सहभागिता इस लिए आवश्यक है ताकि समाज की प्रमुख संस्थाओं के पर्याप्त विनिमय हों और राजनीतिक दलों में अधिक खुलापन और उत्तरदायित्व के भाव हों।
सहभागी लोकतन्त्र के सिद्धान्तकारों के अनुसार यदि नीतिगत निर्णय लेने का जिम्मा केवल अभिजन वर्ग तक सीमित रहता है तो उसके लोकतन्त्र का वास्तविक स्वरूप बाधित होता है। इसलिए वे इसमें आम आदमी की सहभागिता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि यदि लोकतान्त्रिक अधिकार कागज के पन्नों अथवा संविधान के अनुच्छेदों तक ही सीमित रहे तो उन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, अतः सामान्य लोगों द्वारा उन अधिकारों का वास्तविक उपभोग किया जाना आवश्यक है।
• लोकतन्त्र राज्य का एक स्वरूप है और वर्ग-विभाजित समाज में सरकार अधिनायकवादी और लोकतांत्रिक दोनों होती है।
यह एक वर्ग के लिए लोकतन्त्र है तो दूसरे के लिए अधिनायकवाद। बुर्जुआ वर्ग चुँकि अपने हित साधन में पूंजीवादी प्रणाली को नियन्त्रित और संचालित करता है, इसलिए उसे सत्ता से बेदखलकर समाजवादी लोकतंत्र को स्थापित करना आवश्यक है।

                मताधिकार 

राज्य के नागरिकों को देश के संविधान द्वारा प्रदत्त सरकार चलाने के हेतु, अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने के अधिकार को मताधिकार कहते हैं। जनतांत्रिक प्रणाली में इसका बहुत महत्व होता है।
लोकतंत्र की नींव मताधिकार पर ही रखी जाती है।
इस प्रणाली पर आधारित समाज व शासन की स्थापना के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मत का अधिकार प्रदान किया जाय।
जिस देश में जितने ही अधिक नागरिकों को मताधिकार प्राप्त रहता है उस देश को उतना ही अधिक जनतांत्रिक समझा जाता है।
इस प्रकार हमारा देश संसार के जनतांत्रिक देशों में सबसे बड़ा है क्योंकि हमारे यहाँ मताधिकार प्राप्त नागरिकों की संख्या विश्व में सबसे बड़ी है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 एक सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को निर्वाचित सरकार के सभी स्तरों के चुनावों के आधार के रूप में परिभाषित करता है। सर्वजनीन मताधिकार से तात्पर्य है कि सभी नागरिक जो 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के हैं, उनकी जाति या शिक्षा, धर्म, रंग, प्रजाति और आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद वोट देने के लिए स्वतंत्र हैं।
नवीन संविधान लागू होने के पूर्व भारत में 1935 के "गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट" के अनुसार केवल 13 प्रति शत जनता को मताधिकार प्राप्त था। 
मतदाता की अर्हता प्राप्त करने की बड़ी बड़ी शर्तें थीं।
केवल अच्छी सामाजिक और आर्थिक स्थिति वाले नागरिकों को मताधिकार प्रदान किया जाता था।
इसमें विशेषतया वे ही लोग थे जिनके कंधों पर विदेशी शासन टिका हुआ था।
अन्य पश्चिमी देशों में, जनतांत्रिक प्रणाली अब पूर्ण विकसित हो चुकी है, एकाएक सभी वयस्क नागरिकों को मताधिकार नहीं प्रदान किया गया था। धीरे धीरे, सदियों में, उन्होंने अपने सभी वयस्क नागरिकों को मताधिकार दिया है।
कहीं कहीं तो अब भी मताधिकार के मामले में रंग एवं जातिभेद बरता जाता है।
परंतु भारतीय संविधान ने धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत मानते हुए और व्यक्ति की महत्ता को स्वीकारते हुए, अमीर गरीब के अंतर को, धर्म, जाति एवं संप्रदाय के अंतर को, तथा स्त्री पुरुष के अंतर को मिटाकर प्रत्येक वयस्क नागरिक को देश की सरकार बनाने के लिए अथवा अपना प्रतिनिधि निर्वाचित करने के लिए "मत" (वोट) देने का अमूल्य अधिकार प्रदान किया है।
संविधान लागू होने के बाद पिछले वर्षों में भारतीय जनता ने अपने मताधिकार के पवित्र कर्त्तव्य का समुचित रूप से पालन करके प्रमाणित कर दिया है कि उसे जनतंत्र में पूर्ण आस्था है। इस दृष्टि से भी भारतीय जनतंत्र का विशेष महत्व है।