: माँ चंद्रिका के समर्पित साधक थे पं० रमादत्त शुक्ल।
admin Sat, Oct 28, 2023
बीघापुर उन्नाव
पुण्य-तिथि : शरद-पूर्णिमा
माँ चंद्रिका के समर्पित साधक थे पं० रमादत्त शुक्ल।
अध्यात्म-साहित्य साधक पंडित रमादत्त शुक्ल जी की पुण्य-तिथि ( शरद-पूर्णिमा ) के अवसर पर विभिन्न स्थानों के उनके शिष्य एवं अनुयायी रविवार, दिनांक २९ अक्टूबर, २०२३ को मध्याह्न में उन्नाव के बक्सर ग्राम स्थित माँ चण्डिका के प्रख्यात शक्ति-पीठ पर शीश नवाकर उनका स्मरण-वन्दन करेंगे ।
इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गणेश नारायण शुक्ल के अतिथि संपादन में प्रकाशित 'सम्पादक की वाणी' पत्रिका के 'पंडित रमादत्त शुक्ल-स्मृति-अंक' का लोकार्पण एवं विशिष्टजन का सारस्वत सम्मान भी होगा ।
ज्ञातव्य है कि पं० रमादत्त शुक्ल 'सरस्वती' पत्रिका के पूर्व यशस्वी सम्पादक पं० देवीदत्त शुक्ल जी के सुयोग्य पुत्र थे और उनका जन्म वैशाख शुक्ल षष्ठी, वि० सं० १९८२ ( सन् १९२५ ) में बकसर स्थित अपने पैतृक आवास पर हुआ था ।
सात वर्ष की आयु में आप शिक्षा-प्राप्ति के लिए बकसर से अपने पिताश्री के पास प्रयाग चले गए, जहाँ उनके पिता पंडित देवीदत्त शुक्ल 'सरस्वती' पत्रिका का सम्पादन करते थे ।
प्रयाग में ही उनकी प्रारम्भिक शिक्षा सम्पन्न हुई और वहीं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने एम० ए० किया ।
१७-१८ वर्ष की आयु में विश्वविद्यालय में 'धुँआधार', 'उपमा' और 'मधूलिका' जैसी विद्यार्थियों की पत्रिका का प्रकाशन-सम्पादन कर अपनी साहित्यिक प्रतिभा से परिचित कराया । सन् १९४६ में अपने पिताश्री के संरक्षण में निकलनेवाली आध्यात्मिक पत्रिका 'चण्डी' के सम्पादन-कार्य से जुड़े ।
इस पत्रिका से उनका जुड़ाव जीवन के अन्तिम समय तक रहा । शुक्ल जी बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न मनीषी थे और जीवन-पर्यन्त आध्यात्मिक-साहित्यिक- सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे ।
सन् १९८७ में अपने पिताश्री पं० देवीदत्त शुक्ल जी के जन्म-शती वर्ष पर उन्होंने 'सम्पादक के संस्मरण' ग्रन्थ का सम्पादन-प्रकाशन तो किया ही, 'सम्पादक की वाणी' नामक आध्यात्मिक-साहित्यिक-सामाजिक सरोकारों से जुड़ी पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू कराया । इस लघु पत्रिका का प्रकाशन वे अपने बल-बूते कराते रहे ।
इस पत्रिका का वे निःशुल्क वितरण करते थे ।
शुक्ल जी ने सौ से अधिक आध्यात्मिक पुस्तकों की रचनाकी, जो देश-विदेश में प्रशंसित हुईं ।
शुक्ल जी प्रगतिशील विचारों के पक्षधर थे और अपनी संस्कृति-संस्कारों-संस्कृत भाषा के प्रति पूर्ण समर्पित और सजग रहते थे।
उनके द्वारा प्रवर्तित 'पंचमुखी अभियान' न केवल अनूठा, अपितु अनुकरणीय था ।
इस अभियान के अन्तर्गत वे दिवंगत मनीषियों, वयोवृद्ध विभूतियों, हिन्दी के समर्पित प्रचारकों, विदुषी महिलाओं एवं भारतीय आध्यात्मिक विज्ञान, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष जैसी महत्त्वपूर्ण विधाओं के प्रचार-प्रसार पर विशेषरूप से बल प्रदान करते थे । प्रयागराज में पंडित बालकृष्ण भट्ट, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी एवं पंडित देवीदत्त शुक्ल जी की स्मृति में आयोजन कराने की परम्परा का सफलतापूर्वक प्रवर्तन किया।
माँ चंद्रिका -धाम के वे अपने पूर्वजों की भाँति समर्पित आराधक रहे ।
समय-समय पर प्रयागराज से चण्डिका-धाम आते रहते थे ।
बक्सर में आयोजित हुए प्रथम बलिदान-समारोह में शुक्ल जी अपने अन्धे पिता पंडित देवीदत्त शुक्ल को प्रयाग से लेकर आए ।
उस समारोह की चर्चा वे यदा-कदा किया करते थे ।
सन् २००९ की पावन शरद-पूर्णिमा की तिथि पर शुक्ल जी प्रयागराज की त्रिवेणी में विलीन हो गए और अपने पीछे छोड़ गए अपनी अमिट स्मृतियाँ ।
रविवार दिनांक २९ अक्टूबर को मध्याह्न में माँ चंद्रिका धाम में दर्शन-पूजन करने के बाद आगंतुक जन पहुँचेंगे बक्सर ग्राम स्थित पंडित शिवाधार शुक्ल एवं देवीदत्त शुक्ल जी की ड्योढ़ी पर ।
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