होलिका दहन : दारुण रात्रि के रूप में होलिका दहन का आध्यात्मिक महत्व और विशेष उपाय
Munesh Kumar Shukla Sun, Mar 1, 2026
2 मार्च 2026 को मनाया जाने वाला होलिका दहन धार्मिक, आध्यात्मिक और तांत्रिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार वर्ष भर में चार ऐसी रात्रियां होती हैं जिन्हें विशेष रूप से ऊर्जावान और प्रभावशाली माना गया है, और होलिका दहन की रात उनमें से एक है। तंत्र और आगम शास्त्रों में इसे ‘दारुण रात्रि’ तथा ‘सिद्धि की रात्रि’ कहा गया है। मान्यता है कि इस रात किए गए मंत्र जाप, साधना और अनुष्ठान सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक शीघ्र और प्रभावी फल देते हैं। पौराणिक दृष्टि से यह पर्व होलिका रूपी नकारात्मकता के दहन और भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति व चेतना की विजय का प्रतीक है।यह अग्नि का पर्व है और होलिका की अग्नि को अत्यंत पावन माना जाता है। विश्वास है कि यह अग्नि संचित दोषों, नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक विकारों को भस्म करने की क्षमता रखती है। साधक इस रात जागरण कर आत्म-शक्ति को जाग्रत करने का प्रयास करते हैं। हालांकि शास्त्रों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी गुप्त या तांत्रिक साधना को बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के नहीं करना चाहिए।पारंपरिक उपायों में शरीर पर सरसों या चने के आटे का उबटन लगाकर उसके सूखे अंश को एकत्र कर होलिका की अग्नि में समर्पित करना रोग और शोक के दहन का प्रतीक माना गया है। नजर दोष या व्यापारिक बाधाओं से मुक्ति के लिए सूखे नारियल का सात बार उतारा कर उसे अग्नि में अर्पित करने की परंपरा है। अगले दिन होलिका की ठंडी राख को घर के मुख्य द्वार पर छिड़कना सुरक्षा कवच के रूप में माना जाता है। साथ ही घर के मंदिर में शुद्ध घी का दीपक जलाकर और कपूर का धुआं करने से सकारात्मक ऊर्जा और शुद्धता का संचार होता है।
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