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बिहार मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त : चुनाव आयोग और राज्य सरकार से मांगा जवाब

Munesh Kumar Shukla Tue, Jun 16, 2026

बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति और पद पर बने रहने की वैधता को लेकर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत निर्वाचन आयोग, बिहार सरकार और स्वयं दीपक प्रकाश को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि बिहार विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य न होने के बावजूद दीपक प्रकाश किस आधार पर मंत्री पद पर बने हुए हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सभी पक्षों से मामले पर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दीपक प्रकाश न तो बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य हैं, इसके बावजूद उन्हें दोबारा मंत्री नियुक्त किया गया और वे अब भी कैबिनेट का हिस्सा बने हुए हैं।

दीपक प्रकाश राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रमुख एवं राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र हैं। वे बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में पंचायती राज मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। हाल ही में बिहार विधान परिषद में उन्हें स्थान नहीं मिलने के बाद उनकी मंत्री पद पर वैधानिक स्थिति को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।

इस बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी रही कि भाजपा ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा के भाजपा में विलय का प्रस्ताव दिया था। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और एनडीए में बने रहते हुए अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान कायम रखने का निर्णय लिया। बताया जाता है कि नवंबर 2025 में जब दीपक प्रकाश को पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था, तब भी ऐसे प्रस्तावों पर चर्चा हुई थी, लेकिन कुशवाहा ने पार्टी के विलय से इनकार कर दिया था।

भारतीय संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य न होने पर भी मंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत ऐसे मंत्री को छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना आवश्यक होता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो वह मंत्री पद पर बने नहीं रह सकता। इसी संवैधानिक प्रावधान के आधार पर अब सुप्रीम कोर्ट में दीपक प्रकाश की नियुक्ति और उनके पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती दी गई है, जिस पर अदालत की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।