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admin Mon, Aug 29, 2022
लखनऊ
भारत का अंग्रेजी से मुक्त होना है जरूरी -हृदयनारायण दीक्षित
अंग्रेजी से होती है पराधीनता की अनुभूति
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हृदयनारायण दीक्षित[/caption]
भाषा अद्भुत लब्धि है। भाषा से समाज बना। समाज ने भाषा का संर्वद्धन किया। भाषा सामूहिक सम्पदा है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का समूचा ज्ञान भारतीय भाषाओं में उगा। विचारों का जन्म और विकास मातृभाषा की ही गोद में होता है। मातृभाषा अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम होती हैं। भारत में अनेक समृद्ध भाषाएं हैं। लेकिन विदेशी भाषा अंग्रेजी की ठसक है। अंग्रेजी के जानकार विशिष्ट विद्वान माने जाते हैं। अंग्रेजी ज्ञान श्रेष्ठता है। अंग्रेज भारत आए। अंग्रेजी लाए। अंग्रेजी के साथ अपनी संस्कृति भी लाए। अंग्रेजों व अंग्रेजी विद्वानों ने प्रचारित किया कि भारत पहले राष्ट्र नहीं था। अंग्रेजों ने ही भारत को राष्ट्र बनाया। इस सबसे राष्ट्रीय क्षति हुई। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने भोपाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आयोजित कार्यक्रम में अंग्रेजी के आकर्षण पर टिप्पणी की है, ‘‘अंग्रेजी के मोह की वजह से हम अपनी प्रतिभा का 5 प्रतिशत उपयोग ही देश के विकास में कर पा रहे हैं। आज भी 95 प्रतिशत बच्चे मातृभाषा में पढ़ते हैं। जिस दिन स्थानीय भाषा में पढ़े बच्चों की देश की हर व्यवस्था में पूछ होगी उस दिन भारत विश्व फलक पर सूर्य की भांति चमकेगा।‘‘ शाह की चिंता सही है। भारत को अंग्रेजी और अंग्रेजियत के मोहपाश से मुक्त होना चाहिए।
अंग्रेजी को विश्वभाषा कहा जाता है। लेकिन जापान, रूस, चीन आदि देशों में अंग्रेजी की कोई हैसियत नहीं है। एशिया महाद्वीप के 48 देशों में भारत के अलावा किसी भी देश की मुख्य भाषा अंग्रेजी नहीं है। अजरबैजान की भाषा अजेरी और तुर्की है। इसराइल की हिब्रू। उज्बेकिस्तान की उज्बेक। ईरान की फारसी। सऊदी अरब, सीरिया, इराक, जॉर्डन, यमन
हृदयनारायण दीक्षित[/caption]
भाषा अद्भुत लब्धि है। भाषा से समाज बना। समाज ने भाषा का संर्वद्धन किया। भाषा सामूहिक सम्पदा है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का समूचा ज्ञान भारतीय भाषाओं में उगा। विचारों का जन्म और विकास मातृभाषा की ही गोद में होता है। मातृभाषा अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम होती हैं। भारत में अनेक समृद्ध भाषाएं हैं। लेकिन विदेशी भाषा अंग्रेजी की ठसक है। अंग्रेजी के जानकार विशिष्ट विद्वान माने जाते हैं। अंग्रेजी ज्ञान श्रेष्ठता है। अंग्रेज भारत आए। अंग्रेजी लाए। अंग्रेजी के साथ अपनी संस्कृति भी लाए। अंग्रेजों व अंग्रेजी विद्वानों ने प्रचारित किया कि भारत पहले राष्ट्र नहीं था। अंग्रेजों ने ही भारत को राष्ट्र बनाया। इस सबसे राष्ट्रीय क्षति हुई। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने भोपाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आयोजित कार्यक्रम में अंग्रेजी के आकर्षण पर टिप्पणी की है, ‘‘अंग्रेजी के मोह की वजह से हम अपनी प्रतिभा का 5 प्रतिशत उपयोग ही देश के विकास में कर पा रहे हैं। आज भी 95 प्रतिशत बच्चे मातृभाषा में पढ़ते हैं। जिस दिन स्थानीय भाषा में पढ़े बच्चों की देश की हर व्यवस्था में पूछ होगी उस दिन भारत विश्व फलक पर सूर्य की भांति चमकेगा।‘‘ शाह की चिंता सही है। भारत को अंग्रेजी और अंग्रेजियत के मोहपाश से मुक्त होना चाहिए।
अंग्रेजी को विश्वभाषा कहा जाता है। लेकिन जापान, रूस, चीन आदि देशों में अंग्रेजी की कोई हैसियत नहीं है। एशिया महाद्वीप के 48 देशों में भारत के अलावा किसी भी देश की मुख्य भाषा अंग्रेजी नहीं है। अजरबैजान की भाषा अजेरी और तुर्की है। इसराइल की हिब्रू। उज्बेकिस्तान की उज्बेक। ईरान की फारसी। सऊदी अरब, सीरिया, इराक, जॉर्डन, यमन
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