डीपफेक : डीपफेक का धोखा और डिजिटल सख्त नियमों की अनिवार्यता
Munesh Kumar Shukla Sun, Feb 15, 2026
डिजिटल युग में सूचना की गति जितनी तीव्र हुई है, उतनी ही तेजी से भ्रम, छल और दुष्प्रचार की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अब केवल शब्दों से नहीं, बल्कि चेहरों, आवाजों और भाव-भंगिमाओं से भी झूठ को सच की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने डीपफेक और एआई जनित सामग्री के नियमन के लिए आईटी नियमों को सख्त करने का निर्णय लिया है। बीस फरवरी से लागू होने जा रहे नए प्रावधानों के अनुसार एआई द्वारा निर्मित सामग्री पर स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा और किसी भी अवैध या भ्रामक सामग्री को तीन घंटे के भीतर हटाना या ब्लॉक करना होगा। पहले यह समयसीमा 36 घंटे थी। यह बदलाव केवल तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि डिजिटल नैतिकता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की दिशा में एक गंभीर हस्तक्षेप है। पिछले कुछ वर्षों में डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग भयावह रूप से सामने आया है। राजनीतिक नेताओं के फर्जी वीडियो, अभिनेत्रियों की अश्लील रूप से परिवर्तित तस्वीरें, सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाले ऑडियो क्लिप और आर्थिक धोखाधड़ी के लिए बनाए गए कृत्रिम संदेश-ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि तकनीक तटस्थ नहीं रहती, उसका उपयोग और दुरुपयोग दोनों संभव हैं। जब सत्य को जूता जा रहा हो और झूठ को परिष्कृत तकनीक के सहारे प्रमाणिकता का आवरण पहनाकर प्रस्तुत किया जा रहा हो, तब समाज में अविश्वास का वातावरण बनना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा नियंत्रण की पहल आवश्यक प्रतीत होती है, क्योंकि यह केवल अभिव्यक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय है।
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