भारतवर्ष/ अयोध्या /
श्री राम कल्पना
से काया तक ।
राम मंदिर निर्माण और राम लला का भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह युग महोत्सव ।
कलयुग का सबसे बड़ा महोत्सव व त्योहार ।
5 अगस्त 2020 को अयोध्या में श्री राम मन्दिर की आधारशिला रखी गई और इसके साथ ही कई दशकों से चल रहा आंदोलन भी विधिवत रूप से अपने अंजाम तक पहुंचेगा।
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विवादित जमीन को भगवान राम का जन्मस्थान घोषित करने के साथ ही इसे हिंदू पक्ष का आदेश दिया था।
इस फैसले से राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े हजारों-लाखों लोगों की मुहिम और सैकड़ों लोगों की कुर्बानियों को सार्थक बनाया।
1885 में पहला केस, लेकिन 1949 से आंदोलन का आगाज
असल में ये 1885 में पहली बार फैजाबाद की एक अदालत में महंत रघुबीर दास के मस्जिद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के साथ इस आंदोलन के बीज पड़े थे, लेकिन इस आंदोलन की असली शुरुआत हुई थी
1949 में।
विवादित स्थल पर पहले से ही ताला लगा था, लेकिन 1949 में ढांचे के भीतर भगवान राम की मूर्तियां मिली थीं और यहीं से आंदोलन की असल नींव पड़ी थी।
इसके बाद सरकार ने विवादित स्थल पर ताला जड़ दिया था और सभी के प्रवेश पर रोक लगा दी थी
इसके बाद हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने अदालत में मुकदमा दर्ज करा दिया, जिसका पटाक्षेप 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ हुआ।
1984 में निर्णायक आंदोलन का आह्वान
इस पूरे आंदोलन के दौरान अप्रैल 1984 में हुई विश्व हिंदू परिषद की धर्म संसद अहम पड़ाव थी।
इसी धर्म संसद में राम मंदिर को लेकर निर्णायक आंदोलन छेड़ने का फैसला हुआ था।
इसके बाद जुलाई 1984 में अयोध्या में एक और बैठक हुई और गोरक्ष पीठ के महंत अवैद्यनाथ को श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का अध्यक्ष बनाया गया।
वहीं बीजेपी ने राजनीतिक स्तर पर और विश्व हिंदू परिषद ने सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर इस आंदोलन की जिम्मेदारी उठाई।
इसका ही नतीजा हुआ कि 1989 में जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश दिया, तो वीएचपी ने उसके पास ही राम मंदिर की आधारशिला रख डाली।
1990 और 1992 के घटनाक्रमों ने आंदोलन को दी आग।
इस आंदोलन के इतिहास में 2 सबसे बड़ी तारीखें आई 1990 और 1992 में।
1990 में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर के पक्ष में जन समर्थन के लिए रथ यात्रा निकाली, जिसे 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना था। इसके लिए देशभर से लाखों कार सेवक अयोध्या के लिए निकल चुके थे।
आडवाणी का रथ तो बिहार में ही रुक गया था, लेकिन कारसेवक अयोध्या पहुंचने लगे थे
हालांकि मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली यूपी सरकार ने अयोध्या में घुसने पर रोक लगा दी थी।
शहर में कर्फ्यू था और भारी संख्या में पीएसी की तैनाती थी।
फिर भी अशोक सिंघल, विनय कटियार और उमा भारती जैसे नेताओं के नेतृत्व में न देश के अलग-अलग हिस्सों से जुटे हजारों कार सेवक न सिर्फ अयोध्या में घुसे बल्कि विवादित ढांचे की ओर भी बढ़ गए।
इसी बीच विवादित ढांचे के ऊपर कार सेवकों ने भगवा झंडा लहरा दिया और परिणामस्वरूप वहां अफरा-तफरी हो गई. पीएसी ने कार सेवकों को खदेड़ने के लिए गोलीबारी की जिसमें कईयों की मौत हो गई।
वहीं 6 दिसंबर 1992 को मंदिर निर्माण के लिए कार सेवा का आह्वान किया गया था, जिसके बाद लाखों कार सेवक बीजेपी, वीएचपी और बजरंग दल नेताओं के नेतृत्व में पहुंचे थे और देखते ही देखते वहां विवादित ढांचा गिरा दिया गया था।
इन लोगों का रहा बड़ा योगदान
इस पूरे आंदोलन में कई मशहूर तो कई अनजान चेहरों ने अपना योगदान दिया, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं, जो हमेशा लोगों को याद रहेंगे-
महंत रामचंद्र परमहंस
महंत रामचंद्र परमहंस भूमि विवाद और मंदिर आंदोलन से जुड़ने वाले शुरुआती लोगों में से थे।
1949 में जब अचानक विवादित ढांचे के अंदर से भगवान राम की मूर्तियां मिली थीं, तो उसने सबको चौंका दिया था।
असल में इन मूर्तियों को रखने वाले रामचंद्र परमहंस ही थे ।
उन्होंने ही अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर ये मूर्तियां रखी थीं।
इसके बाद विवाद हुआ था और मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया था।
दूसरी तरफ परमहंस ने भी इसको लेकर मुकदमा दायर किया और इस तरह वो इस मामले के सबसे पहले वादियों में शामिल हुए।
1984 में हुई धर्म संसद से लेकर इसके बाद जारी आंदोलन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।
जबकि, एक रोचक पहलू ये है कि इस विवाद के प्रमुख मुस्लिम पक्षकार हाशिम अंसारी और रामचंद्र परमहंस के बीच काफी अच्छे संबंध थे।
दोनों को कई बार अदालती कार्यवाही के दौरान साथ देखा गया।
हलांकि, मंदिर निर्माण का सपना संजोए रामचंद्र परमहंस का 2003 में निधन हो गया।
अशोक सिंघल
विश्व हिंदू परिषद को बड़ी पहचान दिलाने में अशोक सिंघल का सबसे बड़ा योगदान रहा।
देश और विदेश में भी मंदिर निर्माण के पक्ष में माहौल बनाने और आंदोलन में उन्होंने बड़ी और आक्रामक भूमिका निभाई. 1981 में वीएचपी से जुड़ने वाले अशोक सिंघल के नेतृत्व में ही 1984 में विशाल धर्म संसद का आयोजन किया गया।
इसी धर्म संसद में राम मंदिर निर्माण को लेकर निर्णायक आंदोलन शुरू करने का संकल्प लिया गया था।
इसके अलावा 1989 में अयोध्या में विवादित स्थल के पास राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखने में भी सिंघल का अहम योगदान था।
अपनी फायरब्रांड छवि के करान अशोक सिंघल राम भक्तों और हिंदुओ के बीच काफी लोकप्रिय हुए।
हलांकि, 2015 में उनका भी निधन हो गया और अपनी आंखों से वो मंदिर बनते नहीं देख सके, लेकिन उनका सपना जरूर अब साकार हो रहा है।
लालकृष्ण आडवाणी
आडवाणी ने इस आंदोलन को राजनीतिक मुद्दा बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी।
बीजेपी अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 1990 में राम मंदिर निर्माण के लिए जगन्नाथ पुरी से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली थी।
उनका लक्ष्य 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचना था और इसके लिए कई कार सेवक वहां जुटने लगे थे।
हालांकि 23 अक्टूबर को बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार ने उन्हें रोक लिया और गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अपार जन समर्थन जुटाने में वह सफल रहे थे।
इसके बाद 6 दिसंबर 1992 को जिस दिन विवादित ढांचा ढहाया गया था, उस दिन आडवाणी भी वहीं थे।
पार्टी, वीएचपी और बजरंग दल के अन्य नेताओं के साथ वहां मौजूद आडवाणी ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे और मंच से भाषण दे रहे थे।
देखते ही देखते कार सेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया. इस मामले में आडवाणी पर साजिश का मुकदमा दर्ज किया गया, जो आज भी जारी है।
महंत अवैद्यनाथ
गोरखनाथ पीठ के प्रमुख मंहत अवैद्यनाथ इस आंदोलन में काफी आगे रहे।
उनके कहने पर ही 1984 की धर्म संसद में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया था, जिसके वे अध्यक्ष रहे थे।
उन्होंने ही सबसे पहले 1990 में हरिद्वार के संत सम्मेलन में 30 अक्टूबर को मंदिर निर्माण शुरू करने की तारीख तय की थी।
हालांकि, तब यह काम पूरा नहीं हो सका था, जिसके बाद 1992 में एक बार फिर 6 दिसंबर को मंदिर निर्माण के लिए कार सेवा शुरू करने का आह्वान भी उन्होंने ही किया था।
12 सितंबर 2014 को उनका निधन हो गया था और उनके बाद योगी आदित्यनाथ ने गोरखनाथ पीठ में उनकी गद्दी संभाली थी।
कोठारी बंधु
सिर्फ 22 और 20 साल के भाई राम और शरद कोठारी बंगाल के रहने वाले थे।
30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में मंदिर निर्माण की तारीख के एलान और आडवाणी के रथ के पहुंचने की तारीख को देखते हुए दोनों भाई अयोध्या के लिए निकल पड़े थे।
दोनों बजरंग दल से जुड़े थे।
22 अक्टूबर को दोनों भाईयों ने बनारस अयोध्या के लिए पैदल यात्रा शुरू की थी।
अयोध्या में जारी कर्फ्यू के बीच दोनों भाई सबसे पहले पहुंचने वालों में से थे. 30 अक्टूबर को जब वीएचपी और बजरंग दल के नेता विवादित ढांचे की ओर बढ़ रहे थे, उसी बीच दोनों भाई ढांचे के ऊपर गुम्बद में चढ़ गए और वहां भगवा झंडा फहरा दिया।
इसने वहां मौजूद लोगों को चौंका दिया।
हालांकि, कुछ ही देर में वहां सुरक्षाबलों ने भीड़ को रोकने के लिए गोलीबारी कर दी और इसमें दोनों भाईयों की भी मौत हो गई।
इनके अलावा भी मंदिर निर्माण आंदोलन से कई ऐसे लोग जुड़े थे, जिनका इस पूरी मुहिम में बड़ा योगदान था।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी की 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में दिए गए भाषणों ने कार सेवकों में जोश भरा था।
वहीं उमा भारती, साध्वी ऋतंबरा और विनय कटियार जैसे नेता भी थे, जिनके उग्र भाषणों ने कार सेवकों को भड़काया था।
राम मंदिर का मूल डिज़ाइन 1988 में अहमदाबाद के सोमपुरा परिवार द्वारा तैयार किया गया था।
सोमपुरा ने कम से कम 15 पीढ़ियों से दुनिया भर में 100 से अधिक मंदिरों के डिजाइन में योगदान दिया है, जिसमें सोमनाथ मंदिर भी शामिल है।
मंदिर के मुख्य वास्तुकार चंद्रकांत सोमपुरा थे, उनकी सहायता उनके दो बेटे, निखिल सोमपुरा और आशीष सोमपुरा ने की, जो वास्तुकार भी हैं।
मूल से कुछ बदलावों के साथ एक नया डिज़ाइन, 2020 में सोमपुरा द्वारा तैयार किया गया था।
हिंदू ग्रंथों, वास्तु शास्त्र और शिल्प शास्त्रों के अनुसार।
मंदिर 250 फीट चौड़ा, 380 फीट लंबा और 161 फीट (49 मी॰) होगा ऊँचा।
एक बार पूरा होने पर, मंदिर परिसर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हिंदू मंदिर होगा।
इसे नागर शैली की वास्तुकला की गुर्जर - चालुक्य शैली में डिज़ाइन किया गया है, जो एक प्रकार की हिंदू मंदिर वास्तुकला है जो मुख्य रूप से उत्तरी भारत में पाई जाती है।
प्रस्तावित मंदिर का एक मॉडल 2019 में प्रयाग कुंभ मेले के दौरान प्रदर्शित किया गया था।
मंदिर की मुख्य संरचना तीन मंजिला ऊंचे चबूतरे पर बनाई जाएगी।
इसमें गर्भगृह के मध्य में और प्रवेश द्वार पर पांच मंडप होंगे ।
एक तरफ तीन मंडप कुडु, नृत्य और रंग के होंगे, और दूसरी तरफ के दो मंडप कीर्तन और प्रार्थना के होंगे।
नागर शैली में मंडपों को शिखरों से सजाया जाता है।
इमारत में कुल 366 कॉलम होंगे।
स्तंभों में प्रत्येक में 16 मूर्तियाँ होंगी जिनमें शिव के अवतार, 10 दशावतार, 64 चौसठ योगिनियाँ और देवी सरस्वती के 12 अवतार है शामिल ।
सीढ़ियों की चौड़ाई 16 फीट (4.9 मी॰)
होगी ।
विष्णु को समर्पित मंदिरों के डिज़ाइन के अनुसार, गर्भगृह अष्टकोणीय होगा।
मंदिर 10 एकड़ में बनाया जाएगा ,
और 57 एकड़ भूमि में एक प्रार्थना कक्ष, एक व्याख्यान कक्ष, एक शैक्षिक सुविधा और एक संग्रहालय और एक कैफेटेरिया सहित अन्य सुविधाओं के साथ एक परिसर में विकसित किया जाएगा।
मंदिर समिति के अनुसार, 70,000 से अधिक लोग इस स्थल का दौरा कर सकेंगे।
लार्सन एंड टुब्रो ने मंदिर के डिजाइन और निर्माण की निःशुल्क देखरेख करने की पेशकश की, और इस परियोजना का ठेकेदार बन गया।
केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय भू भौतिकीय अनुसंधान संस्थान और बॉम्बे, गुवाहाटी और मद्रास आईआईटी मिट्टी परीक्षण, कंक्रीट और डिजाइन जैसे क्षेत्रों में सहायता कर रहे हैं।
600,000 से पूरा होगा निर्माण कार्य राजस्थान के बांसी से प्राप्त बलुआ पत्थर।
मंदिर के निर्माण में लोहे का कोई उपयोग नहीं होगा और पत्थर के खंडों को जोड़ने के लिए दस हजार तांबे की प्लेटों की आवश्यकता होगी।
सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम में, थाईलैंड भी राम जन्मभूमि पर मिट्टी भेजकर राम मंदिर के उद्घाटन में प्रतीकात्मक रूप से योगदान दे रहा है, जो मंदिर के सम्मान के लिए थाईलैंड की दो नदियों से पानी भेजने के अपने पूर्व संकेत पर आधारित है।
राम मंदिर एक महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर है जो वर्तमान में भारत के उत्तर प्रदेश के अयोध्या में निर्माणाधीन है।
जनवरी २०२४ में इसका गर्भगृह तथा प्रथम तल बनकर तैयार है और २२ जनवरी २०२४ को इसमें श्रीराम की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जायेगी।
भौगोलिक निर्देशांक
26°47′44″N 82°11′39″E / 26.7956°N 82.1943°E
1 केंद्रीय मंदिर जिसके चारों ओर 6 और मंदिर है जो एक मंदिर परिसर के रूप में जुड़े हुए हैं
यह मंदिर उस स्थान पर स्थित है जिसे हिंदू धर्म के प्रमुख देवता राम का जन्मस्थान माना जाता है।
पहले, इस स्थान पर बाबरी मस्जिद थी, जिसका निर्माण एक मौजूदा गैर-इस्लामी ढांचे को ध्वस्त करने के बाद किया गया था, जिसे बाद में ध्वस्त कर दिया गया था।
2019 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित भूमि पर फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि यह भूमि हिंदुओं की है, जो इस पर राम मंदिर का निर्माण कर सकते हैं।
मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन का एक अलग टुकड़ा दिया जाएगा।
अदालत ने साक्ष्य के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें ध्वस्त की गई बाबरी मस्जिद के नीचे एक गैर-इस्लामिक संरचना की मौजूदगी का सुझाव देने वाले सबूत दिए गए थे।
राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत के लिए भूमिपूजन 5 अगस्त 2020 को किया गया था।
वर्तमान में निर्माणाधीन मंदिर की देखरेख श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा की जा रही है।
मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी 2024 को हो रहा है।
72वें गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर उत्तर प्रदेश की झांकी में प्रदर्शित मंदिर की प्रतिकृति
श्री राम का इतिहास
प्राचीन एवं मध्यकालीन
राम एक हिंदू देवता हैं जो विष्णु के अवतार माने जाते है। प्राचीन भारतीय महाकाव्य, रामायण के अनुसार, राम का जन्म अयोध्या में हुआ था।
16वीं शताब्दी में, बाबर ने पूरे उत्तर भारत में मंदिरों पर आक्रमण की अपनी श्रृंखला में मंदिर पर हमला किया और उसे नष्ट कर दिया।
बाद में, मुगलों ने एक मस्जिद, बाबरी मस्जिद का निर्माण किया, जिसे राम की जन्मभूमि, राम जन्मभूमि का स्थान माना जाता है।
मस्जिद का सबसे पहला रिकॉर्ड 1767 में मिलता है, जो जे सुइट मिशनरी जोसेफ टिफेनथेलर द्वारा लिखित लैटिन पुस्तक डिस्क्रिप्टियो इंडिया में मिलता है।
उनके अनुसार, मस्जिद का निर्माण रामकोट मंदिर, जिसे अयोध्या में राम का किला माना जाता है, और बेदी, जहां राम का जन्मस्थान है, उसे नष्ट करके किया गया था।
धार्मिक हिंसा की पहली घटना 1853 में दर्ज की गई थी ।
दिसंबर 1858 में, ब्रिटिश प्रशासन ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा (अनुष्ठान) आयोजित करने से प्रतिबंधित कर दिया। मस्जिद के बाहर अनुष्ठान आयोजित करने के लिए एक मंच बनाया गया था।
आधुनिक युग
22-23 दिसंबर 1949 की रात को बाबरी मस्जिद के अंदर राम और सीता की मुर्तियाँ स्थापित की गईं और अगले दिन से भक्त इकट्ठा होने लगे।
1950 तक, राज्य ने सीआरपीसी की धारा 145 के तहत मस्जिद पर नियंत्रण कर लिया और मुसलमानों को नहीं, बल्कि हिंदुओं को उस स्थान पर पूजा करने की अनुमति दी।
1980 के दशक में, हिंदू राष्ट्रवादी परिवार, संघ परिवार से संबंधित विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने हिंदुओं के लिए इस स्थान को पुनः प्राप्त करने और इस स्थान पर शिशु राम (राम लल्ला) को समर्पित एक मंदिर बनाने के लिए एक नया आंदोलन शुरू किया।
विहिप ने "जय श्री राम" लिखी ईंटें और धन इकट्ठा करना शुरू कर दिया।
बाद में, प्रधान मंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने विहिप को शिलान्यास के लिए आगे बढ़ने की अनुमति दी, तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह ने औपचारिक रूप से विहिप नेता अशोक सिंघल को अनुमति दी।
प्रारंभ में, भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार इस बात पर सहमत हुई थी कि शिलान्यास विवादित स्थल के बाहर किया जाएगा।
हलाँकि, 9 नवंबर 1989 को, वीएचपी नेताओं और साधुओं के एक समूह ने विवादित भूमि के बगल में 200-लीटर (7-क्यूबिक-फुट) गड्ढा खोदकर आधारशिला रखी।
वहीं गर्भगृह का सिंहद्वार बनवाया गया।
इसके बाद विहिप ने विवादित मस्जिद से सटी जमीन पर एक मंदिर की नींव रखी।
6 दिसंबर 1992 को, वीएचपी और भारतीय जनता पार्टी ने इस स्थल पर 150,000 स्वयंसेवकों को शामिल करते हुए एक रैली का आयोजन किया, जिन्हें कारसेवकों के रूप में जाना जाता था।
रैली हिंसक हो गई, भीड़ सुरक्षा बलों पर हावी हो गई और मस्जिद को तोड़ दिया।
मस्जिद के विध्वंस के परिणामस्वरूप भारत के हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच कई महीनों तक अंतर-सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसके प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में बॉम्बे (अब मुंबई ) में अनुमानित 2,000 लोगों की मौत हो गई और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में दंगे भड़क उठे।
मस्जिद के विध्वंस के एक दिन बाद, 7 दिसंबर 1992 को, न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया कि पूरे पाकिस्तान में 30 से अधिक हिंदू मंदिरों पर हमला किया गया, कुछ में आग लगा दी गई और एक को ध्वस्त कर दिया गया। बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों पर भी हमले किए गए।
5 जुलाई 2005 को, पांच आतंकवादियों ने अयोध्या में नष्ट की गई बाबरी मस्जिद के स्थान पर अस्थायी राम मंदिर पर हमला किया।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के साथ आगामी मुठभेड़ में सभी पांचों की मौत हो गई, जबकि हमलावरों द्वारा घेराबंदी की गई दीवार को तोड़ने के लिए किए गए ग्रेनेड हमले में एक नागरिक की मौत हो गई।
सीआरपीएफ को तीन हताहतों का सामना करना पड़ा, जिनमें से दो कई गोलियों के घाव से गंभीर रूप से घायल हो गए।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा 1978 और 2003 में की गई दो पुरातात्विक खुदाई में इस बात के सबूत मिले कि साइट पर हिंदू मंदिर के अवशेष मौजूद थे।
पुरातत्वविद् केके मुहम्मद ने कई वामपंथी झुकाव वाले इतिहासकारों पर निष्कर्षों को कमजोर करने का आरोप लगाया।
इन वर्षों में, विभिन्न शीर्षक और कानूनी विवाद हुए, जैसे कि 1993 में अयोध्या में निश्चित क्षेत्र के अधिग्रहण अधिनियम का पारित होना।
2019 में अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही यह तय हो गया था कि विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए भारत सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट को सौंपी जाएगी। ट्रस्ट का गठन अंततः श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम से किया गया।
5 फरवरी 2020 को, भारत की संसद में यह घोषणा की गई कि भारत सरकार ने मंदिर निर्माण की योजना स्वीकार कर ली है।
दो दिन बाद, 7 फरवरी को, 22 नई मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन आवंटित की गई अयोध्या से दूर धन्नीपुर गाँव में ।
वैसे और कुछ भी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और राम लला की प्राणप्रतिष्ठा युग महोत्सव या इस युग का सबसे बड़ा त्योहार है ।
मुनेश शुक्ला