एनसीईआरटी : सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका पर चर्चापर जताई गंभीर नाराजगी
Munesh Kumar Shukla Wed, Feb 25, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका से जुड़े खंड को लेकर गंभीर नाराजगी जताई है। इस खंड में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और अन्य संवेदनशील मुद्दों का उल्लेख किया गया था, जिसे लेकर अदालत ने स्वतः संज्ञान लेने का संकेत दिया।मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि अदालत किसी भी हाल में न्यायपालिका की छवि खराब होने की अनुमति नहीं दे सकती। उन्होंने कहा कि कानून अपना काम करेगा और आवश्यकता पड़ने पर अदालत इस मामले में स्वतः संज्ञान लेगी। उन्होंने यह भी कहा कि मामला अत्यंत गंभीर है और इसे हल्के में नहीं लिया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिए कि इस विषय में उचित कदम उठाए जाएंगे, हालांकि उन्होंने विस्तार से टिप्पणी करने से परहेज किया।यह विवाद एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में शामिल एक खंड को लेकर उठाया गया, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित चर्चा की गई थी। कई वरिष्ठ वकीलों ने इस पर चिंता जताई। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया जाए। उनका कहना था कि बच्चे जो पढ़ते हैं, वही उनके मन में बैठता है, और यदि न्यायपालिका को लेकर नकारात्मक संदेश जाएगा तो यह संस्थान की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को प्रभावित करेगा।वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस विषय पर चिंता व्यक्त की और कहा कि ऐसी सामग्री शिक्षकों और छात्रों के लिए संतुलित, जिम्मेदार और तथ्यात्मक होनी चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा सामग्री में किसी भी संवेदनशील संस्थान के खिलाफ अप्रभावित और असत्यापित कथन बच्चों की मानसिकता पर गलत प्रभाव डाल सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि मामले में उचित कार्रवाई की जाएगी और न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना आवश्यक है। यह मामला शिक्षा सामग्री और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन का विषय बन गया है। एनसीईआरटी को इस खंड में संशोधन करने या कथ्य को संतुलित रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता पड़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला शिक्षा और न्यायपालिका के बीच संवेदनशील संतुलन की परीक्षा है। अब यह देखा जाएगा कि अदालत इस विषय में क्या दिशा-निर्देश देती है और बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ न्यायपालिका की प्रतिष्ठा कैसे सुरक्षित रहती है।इस विवाद ने शिक्षा और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन की महत्वपूर्ण बहस को फिर से सक्रिय कर दिया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी संवेदनशील विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करते समय सटीक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।
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