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सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त : याचिकाकर्ता संस्था को लगाई फटकार

Munesh Kumar Shukla Tue, May 5, 2026

महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश से जुड़े अहम मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। Indian Young Lawyers Association द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने तीखे सवाल उठाए और इसे कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग की तरह बताया। कोर्ट ने पूछा कि आखिर यह याचिका किस अधिकार से दायर की गई और क्या याचिकाकर्ता खुद को धार्मिक मामलों का निर्णायक मानता है।

यह टिप्पणी नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत कर रहे हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि कोई भी कानूनी संस्था व्यक्तिगत आस्था का दावा नहीं कर सकती, क्योंकि विश्वास व्यक्ति से जुड़ा होता है, संस्था से नहीं। जस्टिस अरविंद कुमार ने भी याचिका दायर करने की प्रक्रिया और संगठन की आंतरिक मंजूरी पर सवाल उठाए।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि ऐसी याचिकाएं दाखिल करने के बजाय संगठनों को युवा वकीलों और न्याय व्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। अदालत ने यह संकेत दिया कि सार्वजनिक हित याचिकाओं का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने बताया कि 2006 में प्रकाशित समाचार रिपोर्टों के आधार पर यह याचिका दायर की गई थी और इसका उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं को बनाए रखना था।

दरअसल, सबरीमाला मंदिर में लंबे समय से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक रही है, जो भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी मानने की परंपरा से जुड़ी है। इसी प्रथा को चुनौती देते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

गौरतलब है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। अदालत ने इसे महिलाओं के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना था। हालांकि, इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस और विरोध देखने को मिला, जिसके चलते कई पुनर्विचार याचिकाएं भी दायर की गईं।

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