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यूरोपीय प्रतिबंधों के बीच रूस का दांव : भारत को सस्ते तेल की पेशकश से बदले समीकरण

Munesh Kumar Shukla Fri, Jun 12, 2026

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में एक नया मोड़ देखने को मिल रहा है। यूरोपीय संघ द्वारा रूस से जुड़े संस्थानों और कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रूस ने भारत सहित अपने प्रमुख साझेदार देशों को रियायती दरों पर तेल आपूर्ति जारी रखने का संकेत दिया है। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और भारत की ऊर्जा रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

यूरोपीय संघ ने हाल ही में रूस के खिलाफ प्रतिबंधों का एक नया पैकेज घोषित किया है। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य उन कंपनियों और संस्थाओं पर दबाव बढ़ाना है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूस की सैन्य और रणनीतिक गतिविधियों से जुड़ी मानी जाती हैं। रिपोर्टों के अनुसार, विभिन्न देशों की कई कंपनियां इन प्रतिबंधों के दायरे में आई हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्तीय लेनदेन और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

दूसरी ओर, रूस ने भारत के साथ ऊर्जा सहयोग को बनाए रखने के संकेत दिए हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। इसका लाभ भारतीय रिफाइनरियों और घरेलू बाजार दोनों को मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस द्वारा दी जा रही छूट ने भारत को ऊर्जा लागत नियंत्रित रखने में मदद की है।

भारत ने इस पूरे मुद्दे पर संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया है। एक ओर वह अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा सहयोग भी बनाए हुए है। सरकार का स्पष्ट रुख रहा है कि राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार की दिशा काफी हद तक रूस, यूरोप और एशियाई देशों के बीच बनने वाले समीकरणों पर निर्भर करेगी। यदि प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ सकता है। ऐसे में भारत की ऊर्जा नीति और आयात रणनीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्व रखेगी।