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कई देशों में टूटे तापमान के रिकॉर्ड, जलवायु परिवर्तन पर बढ़ी चिंता

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यूरोप में भीषण गर्मी का कहर : कई देशों में टूटे तापमान के रिकॉर्ड, जलवायु परिवर्तन पर बढ़ी चिंता

Munesh Kumar Shukla Tue, Jun 30, 2026

यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड सहित कई देशों में तापमान ने पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस असामान्य गर्मी का प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन और लंबे समय तक बने रहने वाले उच्च दबाव वाले मौसमीय तंत्र को माना जा रहा है। लगातार बढ़ते तापमान ने जनजीवन, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे पर गंभीर असर डाला है।

फ्रांस के कई हिस्सों में तापमान 39 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसके चलते प्रशासन को कई क्षेत्रों में विशेष चेतावनी जारी करनी पड़ी। स्कूलों के समय में बदलाव किया गया, सार्वजनिक स्थानों पर शीतल पेयजल की व्यवस्था बढ़ाई गई और लोगों को दोपहर के समय घरों में रहने की सलाह दी गई। ब्रिटेन में भी जून महीने का अब तक का सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया, जबकि स्पेन और जर्मनी में भी कई शहरों ने नए तापमान रिकॉर्ड बनाए।

भीषण गर्मी का असर केवल तापमान तक सीमित नहीं है। कई क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ी हैं, बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है और जल स्रोतों पर भी दबाव बढ़ा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन से जुड़े मामलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है।

रिपोर्टों के अनुसार पिछले दिनों फ्रांस में गर्मी से राहत पाने के लिए नदी और झीलों में उतरे कई लोगों की डूबने से मौत हो गई। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी लोगों को जोखिम भरे कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकती है, इसलिए प्रशासन लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है।

संयुक्त राष्ट्र और जलवायु वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया तो दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी चरम मौसमीय घटनाएं अधिक सामान्य हो जाएंगी। यूरोप की मौजूदा स्थिति को भी इसी व्यापक जलवायु संकट का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए केवल आपातकालीन व्यवस्थाएं ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जलवायु नीतियों को भी प्रभावी ढंग से लागू करना होगा।

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