बृजभूषण सिंह बरी : तीन साल पुराने मामले में अदालत के फैसले से बदला सियासी माहौल
Munesh Kumar Shukla Mon, Aug 3, 2026
करीब तीन वर्षों तक देश की राजनीति, खेल जगत और मीडिया में चर्चा का केंद्र रहे पूर्व भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) अध्यक्ष और पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत से बड़ी राहत मिली है। महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए कथित यौन उत्पीड़न के मामले में अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह और तत्कालीन WFI सहायक सचिव विनोद तोमर को बरी कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी तेज हो गया है।
यह मामला अप्रैल 2023 में उस समय राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया था, जब छह महिला पहलवानों की शिकायत पर दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में FIR दर्ज की गई थी। इसी दौरान एक नाबालिग पहलवान की शिकायत के आधार पर पॉक्सो कानून के तहत भी मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहलवानों ने लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में कई विपक्षी दलों के नेता भी शामिल हुए थे और मामला राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बन गया था।
जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। इसमें चार राज्यों के 22 गवाहों के बयान शामिल थे। बाद में नाबालिग शिकायतकर्ता और उसके पिता ने अपने आरोप वापस ले लिए। इसके बाद पुलिस ने पॉक्सो मामले को समाप्त करने का अनुरोध किया था, जिसे मई 2025 में अदालत ने स्वीकार कर लिया।
मई 2024 में अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ संबंधित धाराओं में आरोप तय किए। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 32 गवाह पेश किए। अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ताओं के बयान मुकदमे के दौरान लगातार बने रहे और अन्य गवाहों ने भी उनका समर्थन किया। शिकायतकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने यह तर्क दिया था कि खेल संघ के शीर्ष पद पर आरोपी के प्रभाव और शक्ति के असंतुलन के कारण शिकायत दर्ज कराने में देरी को समझा जाना चाहिए।
वहीं, बचाव पक्ष ने शिकायतकर्ताओं के बयानों में समय, स्थान और घटनाओं से जुड़े कथित विरोधाभासों का हवाला दिया। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि कुछ घटनाओं के समय बृजभूषण शरण सिंह कथित घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे और शिकायत दर्ज कराने में कई वर्षों की देरी हुई थी।
अदालत के फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने राहत जताई और कहा कि उन्हें शुरू से अपने ऊपर लगे आरोपों के संबंध में न्याय मिलने का भरोसा था। उन्होंने अपनी कानूनी टीम का आभार जताते हुए कहा कि विस्तृत आदेश पढ़ने के बाद ही वह मामले पर विस्तार से टिप्पणी करेंगे।
दूसरी ओर, सरकारी पक्ष ने संकेत दिया है कि विस्तृत न्यायिक आदेश का अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा। अदालत के फैसले ने फिलहाल तीन साल पुराने इस विवाद में एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त कर दिया है, लेकिन इसके राजनीतिक और कानूनी प्रभाव आगे भी चर्चा में बने रहने की संभावना है।करीब तीन वर्षों तक देश की राजनीति, खेल जगत और मीडिया में चर्चा का केंद्र रहे पूर्व भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) अध्यक्ष और पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत से बड़ी राहत मिली है। महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए कथित यौन उत्पीड़न के मामले में अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह और तत्कालीन WFI सहायक सचिव विनोद तोमर को बरी कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी तेज हो गया है।
यह मामला अप्रैल 2023 में उस समय राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया था, जब छह महिला पहलवानों की शिकायत पर दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में FIR दर्ज की गई थी। इसी दौरान एक नाबालिग पहलवान की शिकायत के आधार पर पॉक्सो कानून के तहत भी मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहलवानों ने लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में कई विपक्षी दलों के नेता भी शामिल हुए थे और मामला राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बन गया था।
जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। इसमें चार राज्यों के 22 गवाहों के बयान शामिल थे। बाद में नाबालिग शिकायतकर्ता और उसके पिता ने अपने आरोप वापस ले लिए। इसके बाद पुलिस ने पॉक्सो मामले को समाप्त करने का अनुरोध किया था, जिसे मई 2025 में अदालत ने स्वीकार कर लिया।
मई 2024 में अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ संबंधित धाराओं में आरोप तय किए। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 32 गवाह पेश किए। अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ताओं के बयान मुकदमे के दौरान लगातार बने रहे और अन्य गवाहों ने भी उनका समर्थन किया। शिकायतकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने यह तर्क दिया था कि खेल संघ के शीर्ष पद पर आरोपी के प्रभाव और शक्ति के असंतुलन के कारण शिकायत दर्ज कराने में देरी को समझा जाना चाहिए।
वहीं, बचाव पक्ष ने शिकायतकर्ताओं के बयानों में समय, स्थान और घटनाओं से जुड़े कथित विरोधाभासों का हवाला दिया। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि कुछ घटनाओं के समय बृजभूषण शरण सिंह कथित घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे और शिकायत दर्ज कराने में कई वर्षों की देरी हुई थी।
अदालत के फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने राहत जताई और कहा कि उन्हें शुरू से अपने ऊपर लगे आरोपों के संबंध में न्याय मिलने का भरोसा था। उन्होंने अपनी कानूनी टीम का आभार जताते हुए कहा कि विस्तृत आदेश पढ़ने के बाद ही वह मामले पर विस्तार से टिप्पणी करेंगे।
दूसरी ओर, सरकारी पक्ष ने संकेत दिया है कि विस्तृत न्यायिक आदेश का अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा। अदालत के फैसले ने फिलहाल तीन साल पुराने इस विवाद में एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त कर दिया है, लेकिन इसके राजनीतिक और कानूनी प्रभाव आगे भी चर्चा में बने रहने की संभावना है।
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