बांकीपुर में बड़ा उलटफेर : प्रशांत किशोर की जीत से बीजेपी के गढ़ में बदला सियासी समीकरण
Munesh Kumar Shukla Mon, Aug 3, 2026
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नया संदेश दिया है। सोमवार को घोषित परिणाम में जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले गढ़ में बड़ी जीत दर्ज की। प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 18,953 वोटों के अंतर से हराया। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल यानी RJD तीसरे स्थान पर रही।
बांकीपुर सीट पर हुए इस चुनाव को बीजेपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि यह सीट लंबे समय से पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में शामिल रही है। 1990 से बांकीपुर, जिसे उस समय पटना पश्चिम विधानसभा सीट के नाम से जाना जाता था, बीजेपी का मजबूत आधार रहा है। 1990 से 2005 तक नवीन किशोर इस सीट से लगातार विधानसभा चुनाव जीतते रहे।
नवीन किशोर के निधन के बाद उनके बेटे नितिन नवीन ने 2006 में हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की और पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक बांकीपुर सीट का प्रतिनिधित्व किया। 2025 तक नितिन नवीन इस सीट से विधायक रहे। उनके बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई, जिसके चलते उपचुनाव कराया गया।
प्रशांत किशोर की जीत ने इस सीट के पुराने राजनीतिक समीकरण को बदल दिया है। जनसुराज पार्टी के लिए यह परिणाम खास महत्व रखता है, क्योंकि उसने बीजेपी के लंबे समय से मजबूत माने जा रहे चुनावी आधार को चुनौती दी है।
नतीजे सामने आने के बाद प्रशांत किशोर ने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता सम्राट चौधरी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करती है। प्रशांत किशोर ने कहा कि कोई भी राजनीतिक किला स्थायी नहीं होता और करीब 30 वर्षों से बीजेपी के कब्जे वाली सीट पर बदलाव होने में ज्यादा समय नहीं लगा।
उन्होंने बीजेपी के नेतृत्व और बिहार सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। हालांकि, उनके बयान में लगाए गए आरोप राजनीतिक दावे हैं। दूसरी ओर, उपचुनाव में बीजेपी की हार के बाद पार्टी के लिए अपने मजबूत क्षेत्रों में बदलते जनमत और नए राजनीतिक समीकरणों को समझना अहम होगा।
बांकीपुर का परिणाम फिलहाल बिहार की राजनीति में जनसुराज पार्टी के बढ़ते प्रभाव की चर्चा को तेज कर सकता है। साथ ही, यह बीजेपी और अन्य प्रमुख दलों के लिए भी आगामी चुनावों से पहले अपने संगठन और रणनीति की समीक्षा का संकेत माना जा रहा है।
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