लखनऊ : अयोध्या मार्ग एलिवेटेड रोड योजना पर ब्रेक,सड़क चौड़ीकरण विकल्प पर विचार
Thu, Feb 19, 2026
अयोध्या मार्ग पर प्रस्तावित एलिवेटेड रोड परियोजना फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। करीब 8 किलोमीटर लंबी और लगभग 2000 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना को फिलहाल स्थगित कर शासन ने सड़क चौड़ीकरण और अन्य साधनों के विकल्प पर गंभीरता से विचार शुरू कर दिया है। इस संबंध में शासन ने विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।सूत्रों के अनुसार, अब एलिवेटेड रोड के बजाय पॉलिटेक्निक चौराहे से कामता चौराहे तक सड़क चौड़ीकरण का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। इस विकल्प पर करीब 800 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस नए प्रस्ताव को लागू करने से पहले लोक निर्माण विभाग (PWD) और लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) संयुक्त सर्वे करेंगे। सर्वे में ट्रैफिक लोड, भूमि उपलब्धता, यूटिलिटी शिफ्टिंग और लागत का आकलन किया जाएगा। इसके आधार पर शासन अंतिम निर्णय लेगा।अयोध्या रोड पर बढ़ते ट्रैफिक जाम के मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ खंडपीठ) पिछले लगभग एक वर्ष से सुनवाई कर रहा है। कोर्ट ने शासन से स्पष्ट और प्रभावी कार्ययोजना पेश करने को कहा था। इसके बाद पहले एलिवेटेड रोड का खाका तैयार किया गया था, जिसे पॉलिटेक्निक चौराहे से इंदिरा नहर तक बनाया जाना था। निर्माण एजेंसी के रूप में सेतु निगम को जिम्मेदारी देने की योजना थी।हालांकि, परियोजना की अधिक लागत (1500 करोड़ निर्माण और 500 करोड़ जनसुविधाओं को शिफ्ट करने पर) और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की आशंका के कारण शासन ने वैकल्पिक समाधान तलाशने का निर्णय लिया। अब प्रस्ताव है कि मौजूदा सड़क की चौड़ाई बढ़ाई जाए, सर्विस लेन व्यवस्थित किए जाएं, अवैध अतिक्रमण हटाए जाएं और चौराहों पर ट्रैफिक प्रबंधन सुधारा जाए। जरूरत पड़ने पर चयनित स्थानों पर छोटे फ्लाईओवर या अंडरपास जैसे ढांचागत समाधान भी किए जा सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि एलिवेटेड रोड की तुलना में सड़क चौड़ीकरण न केवल लागत कम करेगा, बल्कि बड़े पैमाने पर संपत्ति अधिग्रहण और ध्वस्तीकरण की समस्या से भी बचा जा सकेगा। इसके अलावा, कार्य चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा, जिससे ट्रैफिक पर कम असर पड़ेगा और जनता को सुविधा में ज्यादा व्यवधान नहीं होगा।अब सभी की निगाहें PWD और एलडीए द्वारा तैयार की जाने वाली संयुक्त सर्वे रिपोर्ट पर टिकी हैं। यही रिपोर्ट तय करेगी कि अयोध्या मार्ग पर जाम से राहत एलिवेटेड रोड के माध्यम से मिलेगी या सड़क चौड़ीकरण और व्यवस्थित प्रबंधन से।
लखनऊ : लखनऊ में सीएसआई टावर लिफ्ट कांड में नया मोड़
Wed, Feb 18, 2026
लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के सीएसआई टावर में हाल ही में हुए लिफ्ट हादसे को लेकर ठेकेदार और प्राधिकरण के बीच विवाद गरमाया है। निरीक्षण के दौरान ठेकेदार असलम आगा ने एलडीए को सीधे जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि लिफ्ट गिरने की घटना वास्तविक रूप में नहीं हुई थी।17 फरवरी को एलडीए के मुख्य अभियंता मानवेन्द्र सिंह को लिखे पत्र में ठेकेदार ने दावा किया कि लिफ्ट झटके ले रही थी, लेकिन इसका कारण अस्थायी बिजली कनेक्शन के चलते वोल्टेज में उतार-चढ़ाव होना था। इसी दौरान लिफ्ट की सुरक्षा प्रणाली सक्रिय हो गई और लिफ्ट स्वतः रुक गई। ठेकेदार ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा प्रणाली काम न करती तो स्थिति गंभीर हो सकती थी, लेकिन लिफ्ट पूरी तरह नीचे नहीं गिरी।ठेकेदार ने पत्र में यह भी कहा कि उसकी जिम्मेदारी केवल लिफ्ट की आपूर्ति और स्थापना तक सीमित थी। अभी तक लिफ्ट का विधिवत कमिश्निंग और हैंडिंग ओवर नहीं हुआ है। स्थायी विद्युत कनेक्शन उपलब्ध कराना एलडीए की जिम्मेदारी थी, जो नहीं दिया गया। अगर स्थायी कनेक्शन समय पर मिलता तो लिफ्ट में यह समस्या नहीं आती।वहीं, एलडीए की ओर से वीसी प्रथमेश कुमार और मुख्य अभियंता मानवेन्द्र सिंह ने बयान दिया है कि लिफ्ट झटके के साथ नीचे की ओर गिरती रही और बीच में अटक गई। उन्होंने कहा कि यदि लिफ्ट बीच में अटकी नहीं होती तो बड़ा हादसा हो सकता था। वीसी प्रथमेश कुमार ने 13 फरवरी को अधिकारियों के साथ लिफ्ट का निरीक्षण भी किया था।अब इस मामले में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब लिफ्ट का औपचारिक हैंडिंग ओवर नहीं हुआ और स्थायी बिजली कनेक्शन भी उपलब्ध नहीं था, तो निरीक्षण और परीक्षण किस आधार पर किया गया। एलडीए और ठेकेदार दोनों ही अपनी-अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट करने में जुटे हुए हैं। इस विवाद ने लिफ्ट सुरक्षा और निर्माण प्रक्रिया में खामियों को भी उजागर किया है।विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सुरक्षा प्रणाली का काम करना ठीक है, लेकिन जिम्मेदारी के स्पष्ट निर्धारण और औपचारिक परीक्षण के बिना निरीक्षण करना जोखिम भरा साबित हो सकता है। इस घटना ने टावर परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों और निरीक्षण प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।सुरक्षा विशेषज्ञों और निर्माण इंजीनियरों का सुझाव है कि आगे से ऐसे सभी टावर और ऊंची इमारत परियोजनाओं में लिफ्ट की स्थापना और परीक्षण की प्रक्रिया को और भी अधिक कड़ा किया जाए। इसमें स्थायी बिजली कनेक्शन, कमिश्निंग, हैंडिंग ओवर और नियमित निरीक्षण अनिवार्य होना चाहिए। यह कदम न केवल भविष्य में हादसों को रोकने में मदद करेगा, बल्कि ठेकेदार और प्राधिकरण के बीच जिम्मेदारी विवाद को भी कम करेगा। इसके साथ ही, लिफ्ट संचालन में आने वाले किसी भी तकनीकी या सुरक्षा संबंधित खतरों की समय पर पहचान और समाधान सुनिश्चित किया जा सकेगा।
लखनऊ : लखनऊ में ATS अफसर बनकर दंपती से 90 लाख ठगे
Tue, Feb 17, 2026
एटीएस का जाल बिछाकर दंपती से 90 लाख रुपए की ठगी करने वाले गिरोह के तीन सदस्यों को लखनऊ पुलिस ने गिरफ्तार किया है। आरोपियों ने दंपती को आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग में फंसाने की धमकी देकर बंधक बना लिया और 12 दिनों में आरटीजीएस के माध्यम से रकम ट्रांसफर करवा ली। गिरोह 3 प्रतिशत कमीशन पर फर्जी बैंक खाते उपलब्ध कराता था।
डीसीपी क्राइम कमलेश दीक्षित ने बताया कि 26 जनवरी 2026 को आलमबाग निवासी राकेश बाजपेई की पत्नी वीना बाजपेई के मोबाइल पर एक कॉल आई। कॉल करने वाले ने खुद को एटीएस मुख्यालय का इंस्पेक्टर रंजीत कुमार बताया। उन्होंने दंपती को आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप लगाकर गिरफ्तारी की धमकी दी। इसके बाद सिग्नल ऐप डाउनलोड कराया गया और अजय प्रताप श्रीवास्तव नामक व्यक्ति ने भी खुद को एटीएस अधिकारी बताकर संपर्क किया। आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट के फर्जी आदेश और सीजर दस्तावेज दिखाकर कहा कि खातों की जांच के लिए रुपए अलग खातों में ट्रांसफर करना होगा। दबाव में आकर दंपती ने 29 जनवरी से 9 फरवरी के बीच अलग-अलग खातों में करीब 90 लाख रुपए भेज दिए। बाद में 11 लाख रुपए और मांगने पर गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी दी गई। पुलिस ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष टीम गठित की और तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया। आरोपियों की पहचान पिपराइच गोरखपुर निवासी मयंक श्रीवास्तव (24), निवाड़ी गाजियाबाद निवासी इरशाद (23) और प्रेम नगर मुंडका दिल्ली निवासी मनीष उर्फ आकाश (24) के रूप में हुई।