तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक पर संकट गहराया : बगावत से कमजोर हुई पलानीस्वामी की पकड़
Munesh Kumar Shukla Thu, May 14, 2026
तमिलनाडु की राजनीति में इस बार विधानसभा चुनाव के बाद बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। कभी राज्य की सबसे मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों में गिनी जाने वाली अन्नाद्रमुक अब अंदरूनी कलह, नेतृत्व संकट और टूट की आशंकाओं से जूझती दिखाई दे रही है। चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के भीतर तेज हुई बगावत ने पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पडी पलानीस्वामी की स्थिति को कमजोर कर दिया है।
12 मई को पलानीस्वामी का जन्मदिन था, लेकिन यह दिन उनके लिए राजनीतिक संकट लेकर आया। अन्नाद्रमुक विधायक दल के करीब तीस विधायकों ने एसपी वेलुमणि और सीवी शण्मुगम के नेतृत्व वाले गुट का समर्थन करते हुए पलानीस्वामी के नाम का विरोध कर दिया। इसके बाद इस गुट ने अभिनेता और तमिलगा वेत्री कझगम प्रमुख जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर दिया।
विधानसभा में पलानीस्वामी और वेलुमणि को अलग-अलग पंक्तियों में सीटें दिए जाने को भी पार्टी में स्पष्ट विभाजन का संकेत माना जा रहा है। हालांकि पलानीस्वामी कुछ विधायकों को वापस अपने पक्ष में लाने में सफल रहे, लेकिन स्थिति पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं दिखी।
विधानसभा में हुए मतदान के दौरान 25 विधायकों ने विजय समर्थित सरकार के पक्ष में मतदान किया, जबकि केवल 22 विधायक टीवीके सरकार के विरोध में रहे। इससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि विधायक दल पर पलानीस्वामी की पकड़ कमजोर पड़ चुकी है और पार्टी के भीतर उनका बहुमत घटता जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह असंतोष केवल विधायक दल तक सीमित नहीं रहेगा। पार्टी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के बीच लगातार चुनावी हार को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। वर्ष 2019 के बाद यह अन्नाद्रमुक की चौथी बड़ी चुनावी हार मानी जा रही है। पार्टी के अंदर अब यह आवाज तेज हो रही है कि पलानीस्वामी के नेतृत्व में संगठन लगातार कमजोर हुआ है और पार्टी को नए नेतृत्व की जरूरत है।
पलानीस्वामी पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि उन्होंने व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पार्टी की मूल विचारधारा से ऊपर रखा। चुनाव परिणामों के बाद उन्होंने कथित तौर पर द्रमुक के बाहरी समर्थन से सरकार बनाने की कोशिश की थी। बागी नेताओं का कहना है कि यह कदम पार्टी संस्थापक एमजी रामचंद्रन और पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की राजनीतिक विचारधारा के खिलाफ था, जिन्होंने हमेशा द्रमुक को अपना मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना था।
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी यह संदेश गया कि सत्ता हासिल करने के लिए अन्नाद्रमुक अपनी पारंपरिक राजनीतिक लाइन से समझौता करने को तैयार हो गई है। यही कारण है कि अब पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और बड़े संगठनात्मक बदलाव की मांग तेज होती जा रही है।
विज्ञापन